अयोध्या की ठंडी शाम में, गोशाईंगंज विधानसभा के लाला कापुरवा से लेकर साल्हीपुर, बरेहटा और बनकठा-तारापुर तक, गांव-गांव में एक ही चर्चा है—क्या सचमुच एसआईआर के नाम पर किसी के अधिकार छीने जाएंगे? और इसी माहौल में आज एक संगोष्ठी में चौधरी लौटनराम निषाद ने मंच पर आते ही भीड़ को एक अलग ही ताप दे दिया। इन्होंने कहा—“देखो भाई! ये जो एसआईआर है न…यह केवल एक कागज़ नहीं है। यह वही पुरानी किताब का नया पन्ना है। जिसकी शुरुआत एनआरसी से हुई थी… और जिसका अंतिम लक्ष्य, जैसा कि कई लोग कहते हैं, पीडीए यानी पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक और आदिवासी समाज को डरा-धमका कर हाशिए पर करना है।” भीड़ सन्न, लेकिन ध्यान जैसे एक जगह टिक गया।

नागरिकता को संदेह के घेरे में डालने की है तैयारी !
निषाद अपनी बात को और धार देते हैं—“ये कहने को फॉर्म है, पर असल में आरएसएस और सत्ताधारी ‘गुजराती गैंग’—जैसा कि कई लोग बोलते हैं—उनके इशारे पर मताधिकार और नागरिकता को संदेह के घेरे में डालने की तैयारी है।” हवा में गूंज उठता है एक गुस्सा, एक बेचैनी, और उतना ही बड़ा सवाल—क्या ये लोकतंत्र का नया इम्तिहान है? निषाद सलाह देते हैं—“फॉर्म भरना है तो दिमाग ठंडा रखकर भरना, बीएलओ से रसीद लेकर रखना…और अपने अधिकारों पर पहरा देना।”
लेकिन ये कहानी सिर्फ आज की नहीं। मंच पर खड़े होकर लौटनराम अचानक भीड़ को 90 साल पीछे ले जाते हैं—सर छोटूराम के समय में। कहते हैं—“आज किसान डरता है कि कहीं उसका नाम लिस्ट में इधर-उधर हुआ तो क्या होगा। लेकिन एक जमाना था जब किसानों का रहनुमा एक ऐसा शख्स था जिसे अंग्रेज भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते थे—सर छोटूराम।”
फिर हवा बदलती है, टोन बदलता है, और मंच पर इतिहास एकदम सिनेमा की तरह जीवित होता है—

हम गोरे व्यापारियों को हटाकर काले व्यापारियों का राज नहीं चाहते !
“1935 में कर्ज़ माफी कानून… 1936 में कर्जदार रक्षक कानून… 1938 में साहूकार पंजीकरण और गिरवी जमीन वापसी कानून… और 1939 का कृषि मार्केटिंग एक्ट—ये सब तब हुए जब देश आज़ाद भी नहीं हुआ था। सर छोटूराम कहते थे—‘हम गोरे व्यापारियों को हटाकर काले व्यापारियों का राज नहीं चाहते, हम चाहते हैं किसान-मजदूर का राज।’ और उनकी सबसे भारी लाइन—‘किसान! दो बातें सीख ले—बोलना सीख ले, और दुश्मन को पहचानना सीख ले।’”
भीड़ तालियां नहीं बजाती—भीड़ सोच में पड़ जाती है।
आज का किसान, आज का मजदूर, आज का नौजवान—क्या वह अपने अधिकारों को पहचान पा रहा है? क्या वह समझ रहा है कि कौन उसके हक में खड़ा है और कौन कागज़ों में उलझाकर उसके अधिकारों को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है? राजनीति सिर्फ वोटों की लड़ाई नहीं रह गई… यह पहचान, दस्तावेज़ और अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।
सभा के आखिर में, जब सूरज ढल चुका है और गांव की गलियों में शाम उतर चुकी है, तब लौटनराम की आवाज़ आखिरी बार गूंजती है—“याद रखो! फॉर्म भरना भी आज आंदोलन है। सावधानी आज सुरक्षा है। और जागरूकता ही असली हथियार है।”
जगन्नाथ पाल हों, अनिरुद्ध मौर्य हों, राजकुमार निषाद, राजेंद्र प्रसाद वर्मा, सिकंदर गौड़, निखिल कन्नौजिया—सैकड़ों लोगों में आज सिर्फ एक बात गूंज रही है—
“सर छोटूराम की चेतावनी फिर से सच तो नहीं हो रही?”
और इसी सवाल के साथ इस कहानी का अध्याय खत्म होता है… लेकिन असली लड़ाई, असली राजनीति—वो अभी शुरू हुई है।
ब्यूरो रिपोर्ट डी.के त्रिपाठी
