लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है जिसने अकादमिक दुनिया, छात्र राजनीति और बहुजन आंदोलन—तीनों को हिला कर रख दिया है। दलित शोधार्थी बसंत कन्नौजिया के निष्कासन के खिलाफ शांतिपूर्ण धरना सात दिन से जारी है, और अब यह मामला सिर्फ एक छात्र का नहीं, बल्कि संविधानिक अधिकारों, अस्मिता और संस्थागत तानाशाही के खिलाफ बड़े संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। प्रशासन ने ‘अनुशासनहीनता’ का आरोप लगाया, लेकिन कन्नौजिया ने इन आरोपों को झूठा बताते हुए साफ कहा—“मैं संविधान के रास्ते पर हूँ और अन्याय के खिलाफ लड़ाई जारी रखूँगा।” लेकिन विवाद तब और गहरा गया जब प्रशासन ने उनके समर्थन में खड़े छात्रों को भी एक-एक कर नोटिस भेजने शुरू कर दिए। सूचना टेक्नोलॉजी विभाग के छात्र शिवम कुमार को जारी चेतावनी पत्र ने पूरे कैंपस में दहशत का माहौल खड़ा कर दिया है। नोटिस में साफ लिखा गया—धरना देना ‘अनुशासनहीनता’ है और ऐसा करने पर दंड दिया जा सकता है। अब सवाल उठ रहा है: क्या शांतिपूर्ण विरोध भी अब अपराध है? और क्या यह वही विश्वविद्यालय है जो बाबासाहेब के नाम पर चलता है या फिर वह मानसिकता जिसमें असहमति से डर कर आवाज़ों को नोटिस भेजे जाते हैं?
कन्नौजिया ने सोशल मीडिया पर सीधा हमला करते हुए कहा—“जहाँ 51 दलित प्रोफेसर हैं, वहीं दलित छात्रों को सबसे ज़्यादा प्रताड़ित किया जा रहा है। प्रशासन जातिवादी मानसिकता से काम कर रहा है।” और अब इस मामले ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। नगिना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने कहा—“BBAU में दलित शोधार्थी पर लगाए गए मनगढ़ंत आरोप लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान हैं। यह सिर्फ एक छात्र की लड़ाई नहीं, यह बहुजन अस्मिता की लड़ाई है।”
उधर अपनी जनता पार्टी के अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी हमला बोला—“सीसीटीवी फुटेज देखे बिना, पक्ष सुने बिना निष्कासन—यह प्रशासन की जातिवादी सोच का सबसे बड़ा उदाहरण है। आज भी शम्बूक और एकलव्य की कहानी दोहराई जा रही है।”
अब धरने में शामिल छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय में दमन का माहौल बना दिया गया है। “नोटिस का डर दिखाकर आवाज़ दबाई जा रही है”—यह कहना है छात्रों का, जो अब पहले से ज्यादा एकजुट दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच कई वरिष्ठ सामाजिक और कानूनी हस्तियाँ भी खुलकर समर्थन में आ चुकी हैं—Dr. P. C. Vidhyarthi और Adv. Shailendra Verma ने कहा है कि बसंत कन्नौजिया का निष्कासन न केवल अवैध है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन ने निष्कासन वापस नहीं लिया तो यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर उठेगा।
धरना स्थल पर माहौल लगातार गर्म है—छात्रों के नारे, पोस्टर, संविधान की प्रतियां, और प्रशासनिक चुप्पी… सब मिलकर एक बड़े संघर्ष की ओर संकेत दे रहे हैं। और आज, संविधान दिवस के ठीक पहले, सवाल बड़ा है—क्या यह विश्वविद्यालय अपने ही नाम के मायने समझता है? या फिर यह वही जगह बन चुका है जहाँ आवाज़ उठाना ‘अपराध’ मान लिया गया है?
धरने पर बैठे छात्रों ने साफ कहा है—“बसंत कन्नौजिया के समर्थन में हमारा आंदोलन जारी रहेगा, यह संविधान दिवस पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी।” और अगर ताज़ा अपडेट की बात करें—कैंपस में आज भी छात्रों का धरना जारी है, समूहों की संख्या बढ़ रही है, और नोटिस भेजने के बावजूद आंदोलन रुकने के कोई संकेत नहीं हैं।
ये मामला अब सिर्फ निष्कासन का नहीं… यह अब एक सवाल बन चुका है—क्या लोकतंत्र नोटिसों से चलता है या आवाज़ों से? और क्या दलित शोधार्थी की लड़ाई इस विश्वविद्यालय की आत्मा को बचाने का आखिरी प्रयास है?
ब्यूरो रिपोर्ट डी के सैम टीवी डिजिटल उत्तर प्रदेश

