जी हां, यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने जैसे ही मंच से INDIA गठबंधन पर निशाना साधा, बिहार की राजनीति में मानो तूफ़ान उठ गया।
योगी ने रैली में कहा — “INDIA गठबंधन में तीन बंदर हैं — पप्पू, टप्पू और अप्पू!” और फिर एक-एक नाम पर निशाना साधते हुए राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव को अपनी सियासी बंदूक का निशाना बना दिया।
लेकिन अब सवाल ये उठता है — क्या ये महज़ चुनावी बयान है, या फिर एक बड़े पॉलिटिकल एजेंडे की शुरुआत?
क्योंकि योगी का ये हमला सिर्फ नामों पर नहीं था — ये था एक नेरेटिव बिल्डिंग — विपक्ष को “अक्षम और अस्थिर” बताने का।
महात्मा गांधी के तीन बंदरों का प्रतीक लेकर उन्होंने सीधा ये मैसेज देने की कोशिश की कि विपक्ष न सच बोलता है, न सच्चाई देखता है, न जनता की सुनता है।
और यही लाइन बीजेपी की रणनीति का हिस्सा लगती है — बिहार में “विकास बनाम भ्रम” की लड़ाई को हवा देना।
अब सोचिए… बिहार चुनाव के बीच जब जनता रोज़गार, बिजली, सड़क और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बहस चाहती है, तब यह “तीन बंदरों” वाला तंज सोशल मीडिया की हेडलाइन बन गया।
ट्विटर, यूट्यूब, और व्हाट्सएप पर “पप्पू-टप्पू-अप्पू” ट्रेंड कर रहा है — लेकिन असली सवाल ये है कि क्या बीजेपी इस बयान से अपना हिंदुत्व और राष्ट्रवाद वाला कार्ड दोबारा सक्रिय करना चाहती है?
या फिर यह बयान उस “भावनात्मक ध्रुवीकरण” की शुरुआत है, जिससे बीजेपी को हर बार चुनावी फायदा मिलता है?
वहीं, विपक्ष भी चुप नहीं है — तेजस्वी यादव ने पलटवार करते हुए कहा कि “योगी जी पहले अपने राज्य की बेरोज़गारी और मंहगाई देखें।”
राहुल गांधी ने ट्वीट किया — “देश को तीन बंदर नहीं, तीन समाधान चाहिए — रोजगार, शिक्षा और न्याय।”
लेकिन सच्चाई ये है कि इस बयान ने बिहार की गलियों से लेकर पटना के कॉफी हाउस तक बहस छेड़ दी है — क्या बिहार की राजनीति फिर से “व्यंग्य बनाम मुद्दे” की राह पर लौट रही है?
क्योंकि याद रखिए — बिहार की जनता अब संवाद चाहती है, ड्रामा नहीं।
और जब सियासत बंदरों के प्रतीक से चलने लगे, तो समझ लीजिए कि मुद्दे कहीं न कहीं पीछे छूटने लगे हैं।
योगी का बयान भले चुनावी मंच से आया हो — लेकिन इसके मायने गहरे हैं।
क्योंकि इसमें सिर्फ विपक्ष पर वार नहीं, बल्कि वोटर की सोच को मोड़ने की कोशिश है।
बिहार की सियासत में अब मुकाबला सिर्फ गठबंधन बनाम गठबंधन का नहीं — बल्कि नेरेटिव बनाम नेरेटिव का है।
और इस वक्त योगी का “तीन बंदर” वाला बयान उसी नेरेटिव का सबसे शातिर, सबसे प्रभावशाली और सबसे धांसू अध्याय बन चुका है।
अब देखना ये है — बिहार की जनता इस सियासी तमाशे पर ताली बजाएगी या सवाल उठाएगी…?
क्योंकि इस बार चुनावी रण में मुद्दे कम, और मज़ाक ज़्यादा नज़र आ रहे हैं — और यही है असली खेल!

