दोस्तों, लोकसभा में जैसे ही मनरेगा का नाम बदलकर VB–जी राम जी करने वाला बिल पेश हुआ, उसी पल संसद में सिर्फ बहस नहीं हुई बल्कि देश की आत्मा, उसकी सोच और उसकी राजनीति की दिशा को लेकर भयंकर टकराव खुलकर सामने आ गया। जिस योजना को देश महात्मा गांधी के नाम से जानता है, जिस योजना ने करोड़ों गरीबों को काम, सम्मान और हक़ दिया, जैसे ही उसके नाम बदलने की प्रक्रिया को बीजेपी ने तेज किया, उसी वक्त भरी संसद में प्रियंका गांधी भड़क गईं। यह कोई साधारण विरोध नहीं था, यह सत्ता की सोच को सीधी चुनौती थी। प्रियंका के तेवर देखते ही देखते पूरे विपक्ष को एकजुट कर गए और संसद का माहौल ऐसा बन गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह तक इस हमले की तीव्रता को नजरअंदाज नहीं कर सके।
मंगलवार को लोकसभा में प्रियंका गांधी भावुक हुईं, लेकिन यह भावुकता निजी नहीं थी, यह भावुकता पूरी तरह राजनीतिक और वैचारिक थी। प्रियंका ने कहा कि महात्मा गांधी भले उनके परिवार से न हों, लेकिन वे पूरे देश के परिवार हैं। और यहीं से असल राजनीति शुरू होती है। क्योंकि गांधी सिर्फ एक नाम नहीं हैं, गांधी एक नैतिक पैमाना हैं, एक कसौटी हैं, और यही कसौटी मौजूदा सत्ता की राजनीति को बार-बार कटघरे में खड़ा कर देती है।
इनसाइड स्टोरी साफ है—बीजेपी को असल दिक्कत किसी योजना से नहीं, बल्कि उस गांधी फ्रेमवर्क से है जिसमें जवाबदेही होती है, नैतिकता होती है और गरीब केंद्र में होता है। मनरेगा में गांधी का नाम रहने का मतलब है कि हर फंड कटौती, हर भुगतान में देरी, हर बकाया मजदूरी का सवाल सीधे गांधी के नाम से जुड़ जाता है। और यही वह नाम है जो सत्ता को असहज करता है, क्योंकि गांधी सवाल पूछते हैं, चुप नहीं रहते।
सरकार कहती है कि नाम बदलने से कुछ नहीं बदलेगा, लेकिन विपक्ष पूछता है कि अगर कुछ नहीं बदलता तो फिर नाम बदलने की ज़िद क्यों? नए बोर्ड, नए दस्तावेज़, नया प्रचार—इन सब पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन मजदूर की दिहाड़ी आज भी जस की तस है। 100 दिन से 125 दिन काम देने की बात है, लेकिन एक दिन की मजदूरी कितनी बढ़ेगी, इस पर पूरी सरकार खामोश है। यही वह बिंदु है जहां प्रियंका गांधी ने सत्ता को बेनकाब कर दिया।
असल लड़ाई गांधी बनाम गोडसे की नहीं है, राम बनाम गांधी की भी नहीं है। असल लड़ाई उस विचारधारा की है जो सवालों से डरती है और उस नाम से चिढ़ती है जो सवाल पूछना सिखाता है। मनरेगा से गांधी हटाना सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, यह एक गहरा राजनीतिक संकेत है कि देश को किस दिशा में सोचने की ट्रेनिंग दी जा रही है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इस बिल को बिना व्यापक बहस के आगे बढ़ाएगी या विपक्ष के दबाव में इसे स्टैंडिंग कमेटी को भेजना पड़ेगा। लेकिन इतना तय है कि मनरेगा का नाम बदलने की यह कोशिश बीजेपी को एक बार फिर उसी सवाल के घेरे में ले आई है, जिससे वह सबसे ज्यादा बचना चाहती है—और वह सवाल है गांधी का सवाल।
ब्यरो रिपोर्ट डी के त्रिपाठी सैम टीवी डिजिटल

