दोस्तों उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा विस्फोट होने जा रहा है, जिसकी गूंज सिर्फ प्रतापगढ़ तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सत्ता के गलियारों में खलबली मचा देगी… जी हा कुंडा… वही कुंडा, जो सालों से राजा भैया का अभेद्य किला माना जाता रहा है, जहां चुनाव नहीं बल्कि इतिहास दोहराया जाता था… लेकिन अब 2027 से पहले इसी किले पर समाजवादी पार्टी ने सबसे बड़ा सियासी हमला बोल दिया है… और इस बार हमला सीधा है, रणनीतिक और बेहद खतरनाक है… पारिवारिक विवादों में उलझे रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के खिलाफ अखिलेश यादव ने जो चाल चली है, इसने कुंडा की राजनीति का तापमान अचानक से आसमान पर पहुंचा दिया है… अंदरखाने से जो खबर निकलकर सामने आ रही है, वो ये कि समाजवादी पार्टी ने कुंडा सीट को “मिशन 27” की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बना दिया है…यहाँ सिर्फ एक उम्मीदवार नहीं उतारा जा रहा, बल्कि राजा भैया के पूरे राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती देने की तैयारी है…

सूत्रों की मानें तो अखिलेश यादव ने साफ संदेश दे दिया है कि इस बार बाहुबल नहीं, सामाजिक संतुलन और पीडीए फार्मूला तय करेगा कि कुंडा का राजा कौन होगा… इसी रणनीति के तहत जिस नाम पर सबसे गंभीर मंथन हुआ है, वो नाम है ज्योत्सना सिंह… ये एक ऐसा चेहरा जो न सिर्फ स्थानीय है, बल्कि सपा के नए राजनीतिक एजेंडे का प्रतीक भी है…
ज्योत्सना सिंह, इनका जुड़ाव सपा सांसद प्रिया सरोज से है, इनकी पारिवारिक जड़ें प्रतापगढ़ की राजनीति में पहले से मौजूद हैं, और इनके जरिए अखिलेश यादव महिला वोट, युवा वोट और पीडीए समीकरण को एक साथ साधने का प्लान बना चुके हैं… पार्टी के अंदर की बैठकों में कुंडा को लेकर जो फीडबैक आया, उसने साफ कर दिया कि पहली बार राजा भैया के खिलाफ “अजेय” वाली धारणा कमजोर पड़ रही है…
गांव-गांव से रिपोर्ट आ रही है कि पारिवारिक विवादों, राजनीतिक अकेलेपन और बदले हुए जातीय समीकरणों ने राजा भैया के किले में दरार डाल दी है… और ठीक इसी मौके पर सपा ने ज्योत्सना सिंह को आगे बढ़ाकर साइलेंट अटैक कर दिया है… ये सिर्फ टिकट का इशारा नहीं है, ये संदेश है कि अब कुंडा में मुकाबला होगा… अखिलेश यादव की पॉवर पॉलिटिक्स इस बार सीधी है,
वे पूर्वांचल और मध्य यूपी में नए चेहरे उतारकर पुराने किंगमेकर्स की राजनीति को खत्म करना चाहते हैं… पंचायत स्तर से लेकर विधानसभा तक उम्मीदवारों की अर्ली डिक्लेरेशन पर काम चल रहा है, ताकि जमीन पर संगठन पहले ही राजा भैया के नेटवर्क को चुनौती दे सके… अंदर की खबर ये भी है कि सपा महिला सभा, युवजन सभा और स्थानीय जातीय संगठनों को कुंडा में एक्टिव मोड में डाल दिया गया है… यानी लड़ाई सिर्फ नेता बनाम नेता की नहीं होगी, बल्कि नेटवर्क बनाम नेटवर्क की होगी… अगर ये दांव बैठ गया तो ये सिर्फ राजा भैया की हार नहीं होगी, बल्कि यूपी की राजनीति में बाहुबल के सबसे बड़े प्रतीक का पतन माना जाएगा… यही वजह है कि कुंडा की सियासत में अचानक बेचैनी है, फोन घनघना रहे हैं, पुराने समर्थक नए ठिकाने तलाश रहे हैं और राजा भैया के खेमे में खामोशी बहुत कुछ कह रही है… साफ है कि 2027 से पहले प्रतापगढ़ कुंडा की सीट यूपी की सबसे बड़ी सियासी लैब बन चुकी है… जहां अखिलेश यादव अपना सबसे बड़ा प्रयोग कर रहे हैं… और अगर ये प्रयोग सफल हुआ… तो समझ लीजिए, उत्तर प्रदेश की राजनीति में वो धमाका होगा, जिसकी स्क्रिप्ट अभी से सत्ता के गलियारों में डर पैदा कर रही है…
ब्यूरो रिपोर्ट डी के त्रिपाठी सैम टीवी डिजिटल…

