लखनऊ की ठंडी रातों में शहर सो रहा था, लेकिन शहर के दिल में एक ऐसा ज़हरीला कारोबार धधक रहा था जो न सिर्फ यूपी बल्कि देश की सीमाओं को चीरकर बांग्लादेश तक फैल चुका था। यह कोई छोटा-मोटा नशे का धंधा नहीं था—यह था भारत का सबसे संगठित कफ सिरप सिंडिकेट, जिसके तार दुबई से लेकर गाज़ियाबाद और आज़मगढ़ तक फैले हुए थे। और इस पूरे साम्राज्य की डोर पकड़े बैठा था एक ही नाम—शुभम जायसवाल।
युवक दिखने में आम था, लेकिन दिमाग इतना तेज़ और खेल इतना बड़ा कि पूरा रैकेट फेसटाइम पर चलाता था। अमित टाटा की गिरफ्तारी के बाद जो सच बाहर आया, उसने पुलिस की भी रूह ठंडी कर दी। उसने कबूला कि इस सिंडिकेट ने 100 से ज़्यादा फर्जी फर्में बनाई थीं, जिनका काम सिर्फ एक था—करोड़ों की कफ सिरप खरीदना, स्टॉक गायब करना, और फिर उसे बॉर्डर पार धकेल देना। जिस सिरप को अस्पतालों में मरीज पीते थे, उसकी बोतलें सीमा के उस पार नशे के इंजेक्शन की तरह गटक ली जाती थीं। यह सिर्फ नशे का कारोबार नहीं था, यह था GST का करोड़ों का घोटाला, जहां लेजर में फर्में थी, लेकिन गोदाम में माल नहीं। अमित टाटा ने खुलासा किया कि गैंग का फाइनेंशियल मास्टरमाइंड था शुभम का सीए—तुषार, वही सारा हिसाब रखता था, कागज़ साफ करता था और पैसा दुबई तक पहुंचाता था। उसके साथ था आज़मगढ़ का एक नाम—विकास सिंह, जिसकी जिम्मेदारी थी कि माल किस रास्ते जाएगा, कौन से बॉर्डर से गुजरेगा, किसको कितना देना है। कागज़ों में सब साफ, लेकिन असलियत में सब काला।
गाज़ियाबाद में गैंग मेंबर विभोर राणा की गिरफ्तारी ने इस रैकेट की नींव हिला दी। विभोर के पकड़े जाते ही शुभम को भनक लग गई कि पुलिस उसकी नब्ज तक पहुंच चुकी है, और उसी रात उसने भारत छोड़ दिया। पासपोर्ट पर वैध यात्रा, लेकिन असल मकसद पूरी तरह अवैध—शुभम सीधे दुबई भाग गया, जहां उसके साथ उसका परिवार और साझेदार गौरव जायसवाल व वरुण सिंह पहले से मौजूद थे। दुबई की एक हाई-राइज़ बिल्डिंग से शुभम दिन के उजाले में वैधानिक काम करता दिखता था, लेकिन रात में पूरी गैंग के साथ फेसटाइम पर लाइव होता था—कौनसी खेप कहां से निकलनी है, किसे कितना भेजना है, कौनसा पुलिस पोस्ट कमजोर है, किस फर्म से अगला बिल उठाना है—सब कुछ वहीं से कंट्रोल होता था।
अमित टाटा की स्वीकारोक्ति के बाद पुलिस को पहली बार समझ में आया कि यह कोई लोकल चेन नहीं, बल्कि इंटरनेशनल रूटिंग के साथ एक पूरा कार्टेल है। कफ सिरप की बोतलें सिर्फ दवा की दुकान पर नहीं बिकती थीं, यह पूरी बोतलें ट्रकों में लोड होकर सिल्क साड़ी की तरह बांग्लादेश में तस्करी होती थीं। और ये बोतलें वहां एक रात में लाखों कमवा देती थीं। क्योंकि गरीब, नशे के आदी, और ड्रग्स पर सख्त कार्रवाई वाले देशों में यही कफ सिरप सबसे आसान और सबसे सस्ता नशा था। शुभम ने इसी कमजोरी को अपना साम्राज्य बना लिया था।
पुलिस के हाथ जब 100 फर्जी कंपनियों की फाइलें लगीं तो खुलासा हुआ कि हर फर्म का एक ही पैटर्न था—कुछ महीनों में करोड़ों की खरीद, और फिर बिना किसी बिक्री के अचानक बंद। न मालिक, न दुकान, न कर्मचारी—सिर्फ कागज़ और करोड़ों का फरार माल। हर फर्म के पीछे वही चेहरा—शुभम जायसवाल। यह गैंग केवल पैसे के लिए नहीं, बल्कि कानून की आँख में धूल झोंकने में इतना माहिर था कि कई महीनों तक कोई पकड़ ही नहीं पाया कि अचानक गोदामों से दवाइयाँ गायब कैसे हो रही हैं। लेकिन विभोर राणा की गिरफ्तारी वो चिंगारी बनी जिसने इस पूरे अंधेरे को जलाकर उजाला कर दिया।
अब पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल है—भारत से दुबई भागकर बैठे इस सिंडिकेट के किंगपिन तक कब और कैसे पहुंचा जाए। क्योंकि अमित टाटा का साफ कहना है—“शुभम अब भी सबके संपर्क में है… और रैकेट अभी भी चालू है।” यानि, खेल खत्म नहीं हुआ… खेल शुरू हुआ है।
स्टोरी- डी के त्रिपाठी सैम टीवी डिजिटल

